ऋषिकेश:- अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), ऋषिकेश के फार्माकोलॉजी विभाग के तत्वावधान में क्षमता-निर्माण पहल के अंतर्गत “थेराप्यूटिक ड्रग मॉनिटरिंग (टीडीएम) के लिए हाई-परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी (एचपीएलसी)” विषय पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस पहल का उद्देश्य चिकित्सा पेशेवरों में विश्लेषणात्मक एवं क्लिनिकल प्रयोगशाला कौशल को सुदृढ़ करना है।

एम्स ऋषिकेश की कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह के संरक्षण तथा डीन (एकेडमिक्स) प्रोफेसर डॉ. सौरभ वार्ष्णेय के सह-संरक्षण में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व डीन रिसर्च एवं फार्माकोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. शैलेन्द्र हांडू ने की।

कार्यक्रम मेडिकल कॉलेज भवन के लेवल-4 स्थित फार्माकोलॉजी विभाग में आयोजित किया गया, जिसमें संकाय सदस्यों, वैज्ञानिकों, रेजिडेंट्स और मेडिकल स्नातकों सहित करीब 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों का चयन “पहले आओ, पहले पाओ” के आधार पर किया गया।

इस अवसर पर बताया गया कि एचपीएलसी एक उन्नत विश्लेषणात्मक तकनीक है, जिसका व्यापक उपयोग फार्मास्यूटिकल्स, बायोमेडिकल अनुसंधान और क्लिनिकल डायग्नोस्टिक्स में किया जाता है। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को जैविक नमूनों के विश्लेषण, बायोमार्कर की पहचान और मरीजों में दवा के स्तर की निगरानी में एचपीएलसी की भूमिका से परिचित कराना था। यह तकनीक व्यक्तिगत चिकित्सा तथा अधिक सुरक्षित एवं प्रभावी दवा चिकित्सा में सहायक है।

प्रशिक्षण में सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक (हैंड्स-ऑन) सत्र आयोजित किए गए। प्रथम दिवस के सैद्धांतिक सत्र में एचपीएलसी प्रणाली के घटकों और सिद्धांतों की बुनियादी जानकारी तथा एचपीएलसी आधारित टीडीएम पर चर्चा की गई। हैंड्स-ऑन सत्र में प्रतिभागियों को सॉफ्टवेयर नियंत्रण, एचपीएलसी पैरामीटर सेट करना, क्रोमैटोग्राफी डेटा सिस्टम (सीडीएस), मोबाइल फेज और नमूना तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया।

दूसरे दिन के सैद्धांतिक सत्रों में मेथड डेवलपमेंट एवं वैलिडेशन, समस्या-निवारण एवं रखरखाव, गुणवत्ता नियंत्रण एवं गुणवत्ता आश्वासन तथा क्रोमैटोग्राम की व्याख्या जैसे विषय शामिल रहे। इसके बाद प्रायोगिक सत्र में प्रतिभागियों ने स्वयं उपकरण का संचालन कर नमूनों का विश्लेषण किया।

प्रतिभागियों को प्रयोगशाला के आवश्यक कौशलों के तहत एनालिटिकल बैलेंस, माइक्रोपिपेट, पीएच मीटर, अल्ट्रासोनिक सोनिकेटर, वैक्यूम वाटर फिल्ट्रेशन सिस्टम, नाइट्रोजन इवैपोरेटर तथा प्रयोगशाला एवं रेफ्रिजरेटेड सेंट्रीफ्यूज के उपयोग का भी प्रशिक्षण दिया गया।

कार्यक्रम के आयोजन सचिव एम्स अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक प्रोफेसर डॉ. पुनीत धमीजा तथा सह-आयोजन सचिव डॉ. ज्ञान वर्धन (एसआर) रहे।

कार्यक्रम के रिसोर्स फैकल्टी में एम्स बठिंडा के फार्माकोलॉजी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. विकास कुमार तथा एम्स भुवनेश्वर के फार्माकोलॉजी विभाग के प्रो. आनंद श्रीनिवासन शामिल रहे। उन्होंने प्रतिभागियों का सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक दोनों सत्रों में मार्गदर्शन किया।

बताया गया कि टीडीएम चिकित्सकों को प्रत्येक मरीज के अनुसार दवा की खुराक निर्धारित करने में मदद करता है, जिससे उपचार के परिणाम बेहतर होते हैं और दुष्प्रभाव कम किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम क्लिनिकल प्रयोगशालाओं एवं अनुसंधान के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार करने में सहायक हैं। यह पहल सटीक निदान के माध्यम से रोगी देखभाल को बेहतर बनाने तथा चिकित्सा अनुसंधान एवं उपचार संबंधी नवाचारों को बढ़ावा देने की संस्थान की प्रतिबद्धता के अनुरूप है।

कार्यक्रम में डॉ. भूपेंद्र सोलंकी, सहायक आचार्य, औषधि विज्ञान विभाग, एम्स ऋषिकेश का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।

CATEGORY: स्वास्थ्य / चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान

By Janswar

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