त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव: जब रिश्ते भारी पड़ते हैं राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता पर।

जब मैंने एक ग्रामीण मतदाता से पूछा कि उन्होंने इस त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में किसे वोट दिया, तो उनका जवाब बेहद सीधा और सहज था – “जो जीत जाए उसी को दे दिया।” यह उत्तर पहली बार में थोड़ा चौंकाने वाला लग सकता है, लेकिन यह ग्रामीण भारत के पंचायत चुनावों की गहरी समझ और जमीनी हकीकत को बयाँ करता है।

शहरी चुनावों और बड़े राजनीतिक दंगल में जहाँ पार्टी, विचारधारा और घोषणापत्र हावी रहते हैं, वहीं त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की तस्वीर बिल्कुल अलग होती है। यहाँ प्रत्याशी अक्सर एक ही गाँव, एक ही मोहल्ले या रिश्तेदारी के होते हैं। वे आपके पड़ोसी होते हैं, जिनके साथ आपका रोज़मर्रा का उठना-बैठना, सुख-दुख साझा करना होता है।

जैसा कि उस मतदाता ने स्पष्ट किया, “पार्टी बाद में आती है, पहले आपसी संबंध और व्यवहार महत्वपूर्ण होता है।” यह बात बिल्कुल सच है। गाँव में हर कोई एक-दूसरे को जानता है। कौन किसके काम आता है, कौन किस मौके पर साथ खड़ा होता है, यह सब मायने रखता है। चुनावी प्रतिद्वंद्विता के चक्कर में सदियों पुराने रिश्तों को बिगाड़ना ग्रामीण समाज के लिए स्वीकार्य नहीं होता।

ग्रामीण मतदाता इस बात को भली-भांति समझते हैं कि चुनाव पाँच साल में एक बार आते हैं, लेकिन रिश्ते आजीवन चलते हैं। इसलिए, वे अक्सर ऐसी रणनीति अपनाते हैं जहाँ वे किसी एक प्रत्याशी के प्रति अत्यधिक निष्ठा न दिखाएं, ताकि चुनावी परिणाम जो भी हों, उनके सामाजिक संबंध और व्यवहार पर कोई नकारात्मक असर न पड़े। यह एक तरह की सामाजिक बुद्धिमत्ता है, जो ग्रामीण जीवन की जटिलताओं को साधने में मदद करती है।

इस सोच के पीछे यह भावना भी काम करती है कि जिसे भी चुना जाए, वह अंततः गाँव का ही व्यक्ति होगा और उम्मीद है कि वह गाँव के लिए ही काम करेगा। इसलिए, व्यक्तिगत संबंधों को चुनाव से ऊपर रखना, ग्रामीण समुदायों की एकता और सामूहिकता का प्रतीक है। चुनावी परिणाम जो भी रहें, ग्रामीणों का यह मानना है कि उनका व्यवहार हमेशा एक-सा ही रहेगा, और यही उनके सामाजिक ताने-बाने की मज़बूती है। यह दर्शाता है कि लोकतंत्र सिर्फ वोटों का खेल नहीं, बल्कि रिश्तों और व्यवहार का संतुलन भी है, खासकर ग्रामीण भारत में।

 

By Janswar

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