डीजीपी दीपम सेठ की कार्यशैली पर उठे सवाल, जेनी से मुलाकात को लेकर पुलिस मुख्यालय की कार्यप्रणाली पर निशाना।
देहरादून:- उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक दीपम सेठ की कार्यशैली और आम लोगों से मुलाकात की व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं। असम से देहरादून पहुंची जेनी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद डीजीपी दीपम सेठ के साथ उनकी तस्वीर सामने आने से नया विवाद चर्चा में आ गया है। बताया गया है कि जेनी के पत्र पर दर्ज तारीख के अनुसार, प्रेस कॉन्फ्रेंस से दो दिन पहले ही उनकी डीजीपी से मुलाकात हो चुकी थी। ऐसे में मुलाकात की तस्वीर दो दिन बाद जारी होने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
इस मामले को लेकर एक टिप्पणी में कहा गया है कि दीपम सेठ के डीजीपी बनने के बाद आम लोगों से सीधे मुलाकात के मामले कम ही सामने आए हैं। उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी प्रेम दत्त रतूड़ी, अशोक कुमार और कार्यवाहक डीजीपी अभिनव कुमार के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा गया कि पहले पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी आम लोगों से मुलाकात करने के साथ फोन और व्हाट्सऐप के माध्यम से भी संवाद करते थे।
टिप्पणी में यह भी आरोप लगाया गया है कि वर्तमान में उत्तराखंड पुलिस की वेबसाइट से डीजीपी से लेकर थानेदारों तक के सरकारी मोबाइल नंबर हटा दिए गए हैं, जिससे आम लोगों की अधिकारियों तक पहुंच प्रभावित हुई है।
लेख में जून माह में नगरासू स्थित गुरुद्वारे पर निहंगों के कब्जे के मामले का भी जिक्र किया गया है। उस दौरान पंजाब से आए प्रतिनिधिमंडल के साथ डीजीपी की मुलाकात की तस्वीर सामने आई थी। इसी आधार पर सवाल उठाया गया है कि क्या डीजीपी की मुलाकातों में आम नागरिकों की शिकायतों की अपेक्षा कुछ विशेष मामलों को प्राथमिकता दी जा रही है।
इसके अलावा टिहरी जिले के लंबगांव क्षेत्र में हुए केतन लाल हत्याकांड का मामला भी उठाया गया है। लेखक के अनुसार, इस प्रकरण में अगस्त माह के दौरान डीजीपी से मुलाकात के लिए समय मांगा गया था। इस संबंध में मुख्य सचिव आनंद वर्द्धन से मुलाकात कर ज्ञापन भी सौंपा गया, लेकिन पुलिस मुख्यालय में डीजीपी से मुलाकात नहीं हो सकी।
लेख में दावा किया गया है कि मुलाकात के लिए पहले दस लोगों की संख्या बताई गई, जिसके बाद पांच लोगों के नाम मांगे गए। पांच से अधिक नाम भेजे जाने के बाद भी मुलाकात नहीं हो पाई।
पूरे मामले के माध्यम से पुलिस मुख्यालय की कार्यप्रणाली, आम नागरिकों की शिकायतों की सुनवाई और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए गए हैं। साथ ही डीजीपी पर राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में सक्रियता दिखाने और आम जनता के मामलों में अपेक्षित उपलब्धता न रखने के आरोप लगाते हुए उनकी निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए गए हैं।
नोट: यह समाचार मूल लेख में लगाए गए आरोपों और लेखक के दावों पर आधारित है। संबंधित पुलिस महानिदेशक या पुलिस मुख्यालय का आधिकारिक पक्ष इसमें शामिल नहीं है।
